हर नाटक पर बात करते समय सिनेमा की चर्चा जरुरी नहीं है ।पर सोचिये की क्या आसानी से किसी फ़िल्म की मेकिंग को सिनेमा का मुख्य विषय बनाया जा सकता है वो भी तमाम तरह की बहसो को शामिल करके ।दरअसल संवादो के माध्यम से विचारो की प्रस्तुति और विभिन्न प्रस्तुति शैलियाँ ही रंगमंच को सिनेमा से अलग करती हैं ।भानु भारती निर्देशित 'तमाशा न हुआ 'में टेगौर के नाटक 'मुक्तधारा' की रिहर्सल के बहाने यांत्रिकता ,मनुष्य-प्रकृति सम्बन्ध आदि पर कई तरह के विचार (गाँधी ,मार्क्स ,टेगौर और उत्तर-आधुनिक )व्यक्त किये गए ।घंटे भर के इस नाटक में पंद्रह-बीस मिनट बाद नाटक में सिर्फ एक दृश्य रह गया जहाँ सभी पात्र आपस में बहस कर रहे थे ।यही कारण था की दो-चार मनोरंजनप्रिय लोग नाटक बीच में छोड़कर चले गए अन्यथा श्रीराम सेंटर में खड़े होने के लिए भी जगह नहीं थी ।सारे अभिनेता (रवि खानोलकर ,टीकम जोशी ,दानिश इकबाल ,दक्षा शर्मा आदि ) इतने अनुभवी और मंझे हुए थे कि बहस के दौरान भी नाटक बोझिल नहीं हुआ बल्कि नाटक ख़त्म होने पर कुछ दर्शक इस पर चर्चा करते दिखे ।
यह नाटक रविंद्रनाथ टगौर कि 150 वीं जयंती पर श्रधान्जलिस्वरूप तैयार किया गया ।नाटक में एक थियेटर ग्रुप टेगौर के नाटक 'मुक्तधारा'(१९२२) की रिहर्सल के दौरान नाटक की प्रासंगिकता पर प्रश्न उठाते हैं ।इसके बाद उनके बीच राजनीतिक ,यांत्रिक और सांस्कृतिक सन्दर्भों में व्यक्ति स्वातंत्र्य पर सार्थक चर्चा होती है ।नाटक का निर्देशन और लेखन भानु भारती ने किया है जो अक्सर अपने लेखन पर नाटक करना पसंद करते हैं ।28 -30जून को हुए इस नाटक की दिल्ली में पुनः प्रस्तुति 8 दिसंबर को हुई ।नाटक में किसी ख़ास विचारधारा की पक्षधरता के बिना टेगौर ,गाँधी ,मार्क्स आदि के सन्दर्भों द्वारा सार्थक बहस की गयी ।
नाटक संवादो के माध्यम से ही हमारे सामने आता है ।परन्तु क्या विचार अगर कथा के साथ आयें तो ज्यादा प्रभावी नहीं होता है !यहाँ याद आना प्रासंगिक है -विजय तेंदुलकर की श्रधांजलि में सुनील शानबाग की प्रस्तुति 'सेक्स ,मोरालिटी और सेंसरशिप '।ढाई घंटे की उस प्रस्तुति में 'सखाराम बाइनडर 'की अलग -अलग दृष्यो की प्रस्तुति के साथ विजय तेंदुलकर की संघर्ष- यात्रा और उसी बहाने सेंसरशिप इत्यादि पर सार्थक बहस की गयी और नाटक ने दर्शको का भरपूर मनोरंजन भी किया ।सरकारी आयोजन अक्सर रस्म -अदायगी जैसे होते हैं जहाँ कला के विविध रूपो को अक्सर आधे-एक घंटे में प्रस्तुत किया जाता है ।लगता है यह नाटक उसी प्रयोजन के लिए तैयार किया गया हो ,इसीसे टेगौर की 150 वीं वर्षगांठ पर इस नाटक की देशभर में कई प्रस्तुतियां हुई हैं और हो रहीं हैं।यह बात सही है कि आज हर माध्यम से सार्थक बहस की गुंजाइश ख़त्म हो रही है और जो बहस होते भी हैं वो या तो प्रायोजित होते हैं या किसी विशेष के हित को ध्यान में रखकर ।फिर भी नाटक में मनोरंजन के तत्व के साथ अगर और सार्थक बहस होती तो शायद ज्यादा अच्छा होता ।
